मकर राशि में सूर्य अपने शत्रु ग्रह की राशि में गोचर कर जाता है | फिर इस पर्व का इतना अधिक
महत्त्व क्यों माना जाता है ? वास्तव में वर्ष को दो भागों
में बाँट गया है | पहला भाग "उत्तरायण" और दूसरा
भाग "दक्षिणायन" कहालाता है | मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है इसलिये
इसको उत्तरायणी भी कहते हैं |
तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाते हैं | कर्नाटक, केरल तथा आन्ध्र प्रदेशों में इसे संक्रान्ति और पोंगल दोनों नामों से
मनाया जाता है | क्योंकि यह संक्रान्ति माघ-पौष में
पड़ती है अतः इसे पौषी संक्रान्ति भी कहते हैं | वेदों में
पौष माह को “सहस्य” भी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है वर्ष
ऋतु, अर्थात् शीतकालीन वर्षा ऋतु | पुनर्वसु
और पुष्य नक्षत्रों का उदय इस समय होता है | पुनर्वसु का
अर्थ है एक बार समाप्त होने पर पुनः उत्पन्न होना, पुनः
नवजीवन का आरम्भ करना | और पुष्य अर्थात् पुष्टिकारक |
पौष के अन्य अर्थ हैं शक्ति, प्रकाश, विजय | इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस
संक्रान्ति का इतना अधिक महत्व किसलिये है | यह संक्रान्ति
हमें नवजीवन का संकेत और वरदान देती है |
इस पर्व को परिवर्तन का पर्व भी कहा जा सकता है - एक ऐसा परिवर्तन जो
सार्थकता लिये हुए होता है | तो आइये इस परिवर्तन के प्रकाश पर्व को इस संकल्प के साथ
मनाएँ कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ और दुराचार सूर्यदेव की दृष्टि से भस्म हो
जाएँ और एक स्वस्थ समाज का सूत्रपात हो | इसी कामना के साथ
सभी पाठकों को कल होने वाले मकर संक्रान्ति के प्रकाश पर्व और पोंगल की हार्दिक
शुभकामनाएँ...
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