पिछले दिनों एक महिला अधिवेशन में जाने
का सौभाग्य प्राप्त हुआ | आप
सभी जानते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के साथ साथ गणतन्त्र दिवस और पन्द्रह
आगस्त आदि कुछ ऐसे दिन होते हैं जिनके आस पास इस प्रकार की राष्ट्रीय समस्याओं पर
परिचर्चाओं में वृद्धि हो जाती है | बहरहाल, मंच
पर उपस्थित सभी वक्ता अपने बहुमूल्य विचार प्रस्तुत कर रहे थे परिवार, समाज तथा राष्ट्र के स्तर पर
महिलाओं की भागीदारी के विषय में | उन्हीं में से एक वक्ता का मानना था कि जितने भी नारी
सशक्तीकरण अथवा नारी मुक्ति जैसे आन्दोलन चलाए जा रहे हैं वे सब खोखले हैं और नारी
का तो मुख्य कार्य ही है घर में बैठकर सन्तान को अच्छे संस्कार प्रदान करना | इससे पूर्व भी एक अन्य कार्यक्रम
में बहस का मुद्दा था “काम काजी महिलाएँ परिवार के लिए वरदान हैं या अभिशाप...” और
आश्चर्य की बात ये कि जो कामकाजी महिलाएँ अपने अपने क्षेत्र में कोई मुक़ाम हासिल
कर चुकी हैं वे ही कामकाजी महिलाओं के विरोध में मुखर होकर बोल रही थीं | बड़ा आश्चर्य हुआ देखकर |
महिला के लिए आत्मनिर्भर होना केवल
धनोपार्जन के लिए ही आवश्यक नहीं है | हाँ धनोपार्जन भी कामकाजी होने का एक लाभ है | किन्तु हर महिला में कोई न कोई
योग्यता, कोई न कोई
टेलेंट अवश्य छिपा होता है | और
जब अपनी योग्यता के अनुरूप वह कार्य नहीं कर पाती तो निराशा की शिकार हो जाती है | अतः हर नारी का मौलिक अधिकार है यह
कि उसे उसकी योग्यता के अनुसार कार्य करने दिया जाए |
साथ ही, जितने अधिक लोग परिवार में आत्म निर्भर होंगे उतना ही अधिक
परिवार आर्थिक तथा सामाजिक और वैचारिक स्तर पर मज़बूत बनेगा | और एक सशक्त परिवार से सशक्त समाज
तथा सशक्त समाज से सशक्त देश का निर्माण होता है |
इसलिए देश की आधी आबादी नारी शक्ति
का आत्मनिर्भर होना अत्यन्त आवश्यक है और इस विषय पर किसी प्रकार के वाद विवाद का
प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता...
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