रविवार, 23 नवंबर 2025

अविरल... प्रतिपल... प्रतिक्षण...

 अविरल... प्रतिपल... प्रतिक्षण...

पर्वतों से उतरती / बरसाती ढालान से ढुलकती
तरला चंचला नदिया / लाँघती हुई समस्त सीमाओं को
तोड़ती हुई स्वच्छन्द भाव से सभी मर्यादाओं को
मदमस्त बनी / खोई हुई अपनी ही धाराओं के रूप सौन्दर्य में
रहती है प्रवाहमान अविरल... प्रतिपल... प्रतिक्षण

https://youtu.be/jITpR43nc94

दौड़ी चली जाती है मिलने को प्रियतम से
छोड़ कर पीछे उच्छृंखलताओं की भी सीमाओं को
तज कर सारी वर्जनाओं को...
कहीं अपने ही दीर्घोच्छ्वासों के आघातों से ताड़ित 

लहरों के हृदयों में हलचल मचाती सी...
हटाती हुई नौकाओं की कंचुकी को कुचों से अपने
किसी प्रेममुग्धा नायिका सी...

कहीं लहरों के समतल बिछौने पर विराजमान
ध्यानमग्ना योगिनी सी...
करती है विश्राम कुछ पल को
तो और भी मुखर हो उठता है सौन्दर्य उसका...
राह चलते मेघराज ठहर जाते हैं कुछ पल
आकर्षित हो सौन्दर्य से उसके...
कामतप्ता नायिका सी नदी
कर देती है समर्पित अपना कौमार्य
प्रणय निवेदन पर मेघराज के
और खो जाती है प्रेमपाश में इस सुकुमार प्रेमी के...
भूल जाती है कुछ पल को / कि उसे तो हो जाना है एक
खो जाना है गहराइयों में / संग अपने शाश्वत प्रेमी धीर गम्भीर सागर के...
इन्द्रदूत के ऊष्मित मृदु चुम्बन में खोई
समा लेती है उनकी बून्दों को कोख में अपनी...
करती है उत्पन्न पुनः धवल चंचला लहरों को
और भरकर निज अंक में
कल कल कल प्रवाहित होती / छल छल छल पायल झनकाती
हँसती मुस्कुराती खिलखिलाती / तृप्त करती अपने मीठे जल से हर राही को
अठखेलियाँ करती किनारों के साथ / अपनी धुन में मस्त...
कहीं श्वेत तो कहीं हरीतिमा की झीनी सी चादर ढाँपे
तोड़ती हुई समस्त मर्यादाओं और तटबन्धों को
तो कभी निर्मित करती नवीन तटबन्ध विश्राम हेतु...
पार करती सारी आपदाओं को / छिन्न करती सकल बाधाओं को
मिलने को प्रियतम से जाती है दौड़ी भागी...
उनकी भुजाओं के आलिंगन में प्राप्त कर नवीन ऊर्जा
खिल उठती है पुनः किसी सुकुमारी सी...
और लहरों रूपी शशशिशुओं को छोड़ प्रियतम के पास
चल पड़ती है पुनः खोज में मेघराज की
ताकि प्राप्त कर उनसे अमृत की बून्दें
आप्लावित कर सके भगिनी वसुन्धरा को भी
और होकर हर्षित वह भी / कर सके धारण नवीन वसुओं को...
चलता रहता है यही क्रम निरन्तर... युगों युगों तक...

अविरल... प्रतिपल... प्रतिक्षण...

----------------कात्यायनी.............