देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या,
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या |
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ||
कल तृतीया तिथि है – तीसरा नवरात्र
| इस दिन देवी के चन्द्रघंटा रूप की पूजा अर्चना की जाती है | चन्द्रः
घंटायां यस्याः सा चन्द्रघंटा – आल्हादकारी
चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो वह देवी चन्द्रघंटा के नाम से जानी जाती है –
इसी से स्पष्ट होता है कि देवी के इस रूप की उपासना करने वाले सदा सुखी रहते हैं
और किसी प्रकार की बाधा उनके मार्ग में नहीं आ सकती |
माँ चन्द्रघंटा का वर्ण तप्त स्वर्ण
के सामान तेजोमय है | इस रूप में देवी के दस हाथ दिखाए गए हैं और वे सिंह पर सवार
दिखाई देती हैं | उनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, चक्र, जपमाला, त्रिशूल, गदा और तलवार
सुशोभित हैं | अर्थात् महिषासुर का वध करने के निमित्त समस्त देवों के
द्वारा दिए गए अस्त्र देवी के हाथों में दिखाई देते हैं |
ॐ अक्षस्नक्परशुं गदेषु कुलिशं
पद्मं धनु: कुण्डिकाम्
दण्डं शक्तिमसिंच चर्म जलजं घंटाम्
सुराभाजनम् |
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननाम्
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं
सरोजस्थिताम् ||
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