वन्देsहम् शीतलां
देवीं रासभस्थान्दिगम्बराम्
मार्जनीकलशोपेतां
सूर्पालंकृतमस्तकाम् ||
अर्थात गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश और मस्तक पर सूप का मुकुट धारण करने
वाली भगवती शीतला की हम वन्दना करते हैं | इसी मन्त्र से यह भी प्रतिध्वनित होता
है कि शीतला देवी स्वच्छता की प्रतीक हैं – हाथ में झाडू इसी तथ्य की पुष्टि करती है
कि हम सबको स्वच्छता के प्रति जागरूक और कटिबद्ध होना चाहिए, क्योंकि चेचक, खसरा तथा अन्य भी सभी प्रकार के Infections का
मुख्य कारण तो गन्दगी ही है | साथ ही हाथ में कलश होने का अभिप्राय है कि जहाँ
स्वच्छता होगी वहाँ स्वास्थ्य उत्तम रहेगा, और स्वास्थ्य उत्तम
रहेगा तो समृद्धि भी बनी रहेगी | सूप का भी यही तात्पर्य है कि परिवार धन धान्य से
परिपूर्ण रहे |
देवी का नाम भी
सम्भवतः इसी लोकमान्यता के कारण शीतला पड़ा होगा कि शीतला देवी की उपासना से
दाहज्वर, पीतज्वर, फोड़े फुन्सी तथा चेचक और खसरा जैसे रक्त और
त्वचा सम्बन्धी विकारों तथा नेत्रों के इन्फेक्शन जैसी व्याधियों में शीतलता
प्राप्त होती है और ये व्याधियाँ निकट भी नहीं आने पातीं | आज के युग में भी शीतला
देवी की उपासना स्वच्छता की प्रेरणा के दृष्टिकोण से सर्वथा प्रासंगिक प्रतीत होती
है |
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