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मंगलवार, 20 मार्च 2018

दश महाविद्या


आज तीसरा नवरात्र है और नवरात्रों में कुछ तन्त्र साधक दश महाविद्याओं की सिद्धि के लिए भी साधना करते हैं | शाक्त सम्प्रदाय ने इस विश्वास को पोषित किया कि सर्वशक्तिमान केवल एक नारी ही है | वास्तव में शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही सत्य है तथा शक्ति सर्वत्र व्याप्त भी है | फिर चाहे वह नवदुर्गा के नौ रूपों में प्रतिबिम्बित होती हो अथवा दशमहाविद्याओं के रूप में | दशमहाविद्याओं की साधना यद्यपि तान्त्रिक साधना है, किन्तु यदि साधारण साधक भी यदि इनकी सामान्य रूप से उपासना करें तो उनके लिए भी ये शुभ फलदायी होती हैं |
ये दशो महाविद्याएँ समस्त कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली तथा सर्वार्थ का साधन करने वाली हैं, किन्तु इनकी उपासना की विधियाँ प्रायः तान्त्रिक हैं तथा बहुत कठिन हैं | और हमारा ऐसा मानना है कि गृहस्थी लोगों को इस प्रकार की तान्त्रिक उपासनाओं से प्रायः बचना चाहिए | यदि उपासना में थोड़ी सी भी चूक हो जाए तो न केवल साधक पर बल्कि उसके परिवार के लिए भी घातक सिद्ध हो सकती है |
देवी के सभी रूप समस्त संसार का कल्याण करें यही कामना है...
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सोमवार, 19 मार्च 2018

तृतीया चंद्रघंटा


देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या |
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ||
कल तृतीया तिथि है – तीसरा नवरात्र | इस दिन देवी के चन्द्रघंटा रूप की पूजा अर्चना की जाती है | चन्द्रः घंटायां यस्याः सा चन्द्रघंटा आल्हादकारी चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो वह देवी चन्द्रघंटा के नाम से जानी जाती है – इसी से स्पष्ट होता है कि देवी के इस रूप की उपासना करने वाले सदा सुखी रहते हैं और किसी प्रकार की बाधा उनके मार्ग में नहीं आ सकती |
माँ चन्द्रघंटा का वर्ण तप्त स्वर्ण के सामान तेजोमय है | इस रूप में देवी के दस हाथ दिखाए गए हैं और वे सिंह पर सवार दिखाई देती हैं | उनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, चक्र, जपमाला, त्रिशूल, गदा और तलवार सुशोभित हैं | अर्थात् महिषासुर का वध करने के निमित्त समस्त देवों के द्वारा दिए गए अस्त्र देवी के हाथों में दिखाई देते हैं |
ॐ अक्षस्नक्परशुं गदेषु कुलिशं पद्मं धनु: कुण्डिकाम्
दण्डं शक्तिमसिंच चर्म जलजं घंटाम् सुराभाजनम् |
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननाम्
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ||
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रविवार, 18 मार्च 2018

द्वितीयं ब्रह्मचारिणी


या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा – प्रथम नवरात्र को समस्त हिन्दू समाज ने भगवती के शैलपुत्री रूप की उपासना के साथ नव सम्वत्सर का स्वागत किया | कल द्वितीया तिथि है दूसरा नवरात्र माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना का दिन | देवी का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी का है ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी अर्थात् ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति करना जिसका स्वभाव हो वह ब्रह्मचारिणी | इस रूप में भी देवी के दो हाथ हैं और एक हाथ में जपमाला तथा दूसरे में कमण्डल दिखाई देता है | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है, ब्रह्मचारिणी का रूप है इसलिये निश्चित रूप से अत्यन्त शान्त और पवित्र स्वरूप है तथा ध्यान में मग्न है | यह रूप देवी के पूर्व जन्मों में सती और पार्वती के रूप में शिव को प्राप्त करने के लिये की गई तपस्या को भी दर्शाता है |
दक्षपुत्री सती ने जब अपने पति के अपमान से क्षुब्ध होकर उनके यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया तो पर्वतराज हिमालय और उनकी पत्नी मैना की प्रार्थना पर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया | तब शिव को पति रूप में पुनः प्राप्त करने के लिए वन में जाकर घोर तप किया तथा समस्त प्रकार के भोज्य पदार्थों का त्याग करके केवल केवल कन्द मूल फल का ही भोजन किया | तब भी शिव की तपस्या भंग नहीं हुई तो पार्वती ने कन्द मूल फल का भी त्याग कर दिया और केवल वनस्पतियों का सेवन करती रहीं | उसके पश्चात वनस्पतियों के सेवन का भी त्याग कर दिया और केवल बिल्व पत्र ही ग्रहण करती रहीं | अन्त में ऐसा समय भी आया जब उन्होंने बिल्व पत्रों का भी सेवन बन्द कर दिया और तब उन्हें अपर्णा कहा जाने लगा | इतनी कठोर तपश्चर्या के कारण देवी के इस रूप को तपश्चारिणी भी कहा जाता है |
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलौ, देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा
जो लोग भगवती के नौ रूपों को नवग्रह से सम्बद्ध करते हैं उनकी मान्यता है कि यह रूप मंगल का प्रतिनिधित्व करता है तथा मंगल ग्रह की शान्ति के लिए माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना करनी चाहिए |
ऐसा भी माना जाता है कि अगर आप प्रतियोगिता तथा परीक्षा में सफलता चाहते हैं -  विशेष रूप से छात्रों को - माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना अवश्य करनी चाहिये । इनकी कृपा से बुद्धि का विकास होता है और प्रतियोगिता आदि में सफलता प्राप्त होती है | इसके लिए निम्न मन्त्र के जाप का विधान है:
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदास्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु |
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ||
इसके अतिरिक्त “ऐं ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः” माँ ब्रह्मचारिणी के इस बीज मन्त्र के साथ भी देवी की उपासना की जा सकती है...
दोनों करकमलों में अक्षमाला और कमण्डल धारण किये भगवती का माँ ब्रह्मचारिणी का रूप सबकी रक्षा करे...