ॐ ह्रौं जूँ सः ॐ | ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ |
ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ||
ॐ स्वः भुवः भू: ॐ | ॐ सः जूँ ह्रौं ॐ |
त्रयम्बकम् – जिनकी इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति ये तीन विश्व का निर्माण करने वाली माताएँ हैं
| अथवा जिनके त्रीणि अम्बकानि – तीन नेत्र हैं – ज्योतिषियों
के अनुसार भूत, भविष्य और वर्तमान ये तीन नेत्र भगवान शंकर
के माने जाते हैं, सांख्य सत्व, रजस और
तमस इन तीन गुणों को भगवान शिव के तीन नेत्र मानता है, और
याज्ञिक पृथिवीद्यौरन्तरिक्षौ अर्थात पृथिवी, द्यु तथा
अन्तरिक्ष इन तीनों लोकों को महादेव के तीन नेत्र मानते हैं |
सुगन्धिम् – जो समस्त तत्वों को उनके वास्ताविक
रूप – वास्तविक सुगन्धि - को बनाए रखने की सामर्थ्य प्रदान करता है | अर्थात किसी प्रकार का विकार किसी तत्व में नहीं आने देता |
पुष्टिवर्धनम् – जो समस्त चराचर का पालन करने
वाला है – पौष्टिकता प्रदान करने वाला है |
यजामहे – ऐसे उस परमेश्वर का हम यजन करते हैं |
उर्वारुकमिव मृत्योर्बंधनात् – जिस प्रकार पका
हुआ बिल्वफल बिना किसी कष्ट के वृक्ष के बन्धन से मुक्त हो जाता है उसी प्रकार हम
भी जन्म-मरण रूपी अज्ञान के बन्धन से मुक्त हो जाएँ |
अमृतात मा मुक्षीय – और उस अमर प्रकाशस्वरूप
ब्रह्म से कभी हमारा सम्बन्ध छूटने न पाए |
ऐसी उदात्त भावना जिस मन्त्र की है उसके जाप से
निश्चित रूप से न केवल कालसर्प दोष वरन सभी प्रकार के कष्टों से सबको मुक्ति
प्राप्त हो, यही हमारी सबके लिए मंगलकामना है...
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