मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं




ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं
 


समस्त ब्रह्माण्ड अपने आपमें पूर्ण हैं | ब्रह्माण्डों में व्याप्त समस्त वायु अग्नि जल आदि तत्व, समस्त रूप रस गन्ध आदि अपने आपमें पूर्ण हैं | समस्त काल, समस्त दिशाएँ – कुछ भी अपूर्ण नहीं है – हो ही नहीं सकता – पूर्ण है समस्त विराट् अपने आपमें | इस प्रकार हम सब उस विराट के सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कण होते हुए भी स्वयं में पूर्ण हैं, क्योंकि पूर्ण का अंश हैं | पूर्णता का बोध वास्तव में अद्वितीय होता है और उसका कोई विकल्प भी नहीं होता | और यदि विकल्प खोज भी लिया जाए तो वह भी निश्चित रूप से पूर्ण ही होगा | हम सभी पूर्ण के भीतर भी हैं और हमारे भीतर ही पूर्ण है | क्योंकि हम सभी पूर्ण हैं – क्योंकि हम सभी एक ही पूर्ण का विविध रूपों में विस्तार हैं – अतः स्वयं में हम सभी महान हैं |
जब हम सभी स्वयं में पूर्ण व्यक्तित्व हैं तो किसी की किसी अन्य से तुलना कैसी ? आज महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हम सभी संकल्प लें कि अपनी अपनी “पूर्णता को पूर्ण” रखते हुए, अपने अपने स्वभाव और योग्यता के अनुसार कर्म करते हुए, अपने अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर रहें और ईशोपनिषद के इस कथन का निरन्तर स्मरण करते रहें...
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||
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