पिछले
कुछ समय से पञ्चांग के विभिन्न अवयवों पर चर्चा कर रहे हैं | पञ्चांग के चार अंगों
– दिन, तिथि, नक्षत्र और योग
के बाद अब, पञ्चांग का पाँचवाँ अवयव है करण | तिथि का आधा भाग करण कहलाता है | चन्द्रमा जब
6 अंश पूर्ण कर लेता है तब एक करण पूर्ण होता है | कुल ग्यारह करण होते हैं |
इनमें किन्स्तुघ्न, चतुष्पद, शकुनि तथा नाग ये चार करण हर माह में आते हैं और इन्हें
स्थिर करण कहा जाता है | अन्य सात करण चर करण कहलाते हैं | ये एक स्थिर गति
में एक दूसरे के पीछे आते हैं | इनके नाम हैं: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि जिसे भद्रा भी कहा जाता है |
अन्त में इतना अवश्य कहेंगे कि शुभमुहूर्त - Auspicious Time - में यदि कोई कार्य आरम्भ किया जा सकता है तो अवश्य
करना चाहिए | किन्तु यदि कार्य आवश्यक ही हो और कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल रहा हो
तो Vedic Astrologer व्यक्ति को इस शुभाशुभ मुहूर्त के भय से ऊपर उठकर सकारात्मक
भाव के साथ कर्म करने की ही सलाह देते हैं...
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