भर लें
रोम रोम में शीतल मन्द पवन की मादकता
डूबते
हुए प्रकृति के इस सुहाने हास-विलास में
जो करती
रहती है नित नई संरचना
क्योंकि
शीत की ये सुहानी पीत भोर
करती है
नवीन आशा का संचार कण कण में...
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