स्व और पर - यदि मनुष्य में विजय प्राप्ति और आत्म प्रतिष्ठा की कामना होगी, उसमें स्वाभिमान होगा, तभी उसमें विचार शक्ति का विकास होगा. और विचार शक्ति का विकास होगा, तभी वह कर्म में प्रवृत्त होगा | परिवार, समाज, जातीयता, राष्ट्रवाद इन सबकी सृष्टि इसी विचार शक्ति और कर्म का परिणाम होती है | इसी के कारण जीवों में आत्मीयता का बन्धन दृढ़ होता है, जिनमें आत्मरक्षा और आत्म प्रतिष्ठा की शक्ति अर्थात जीवनी शक्ति नही होती वे वास्तव में सृष्टि प्रवाह में पीछे रह जाते हैं या लुप्त हो जाते हैं… कात्यायनी
https://youtu.be/hmP11ViHUQc
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